नगर पालिका परिषद, इटावा में आपका स्वागत है।
इटावा शहर के नाम की उत्पत्ति स्वयं में रोचक दास्तान से परिपूर्ण है। प्राचीन इटावा शहर का अस्तित्व तथा परम्परा दोनो ही इस रोचक घटना क्रम की पुष्टि करते है। लोक प्रचालित कथानक के अनुसार राजपूत काल में प्रसिद्व चैहान वंश के राजा सुमेरशाह वर्तमान इटावा के निकट यमुना नदी तट पर स्नान करने आए थे नदी तट पर उन्होने प्रकृति का एक विस्मयकारी दृश्य देखा कि एक घाट पर एक बकरी तथा एक भेंड़िया एक साथ पानी पी रहे है। इस विस्मयकारी दृश्य के परिप्रेक्ष्य में राजा ने ज्योतिषीयों से परामर्श लिया, जिन्होने राजा को इस दृश्य वाले स्थान पर एक किले के निर्माण का सुझाव दिया। और ज्योतिषीय गणना के अनुरूप बताया कि इस दृश्य के स्थान पर किले का निर्माण राजा के लिए अत्यन्त शुभ फलदायी होगा।
जब राजा द्वारा इंगित स्थान पर किले का निर्माण कार्य प्रारम्भ किया तो नीव खोदते समय मजदूरो को यहांॅ पर एक सोने की ईट तथा एक चांदी की ईट प्राप्त हुयी मजदूरो ने शोर मचाकर कहा ईट आया अर्थात (ईट मिली, ईट मिली,) मजदूरो के चिल्लाने की ध्वनि के आधार पर उस जगह का नाम ईट आया पड़ा जो कि बाद में क्रमशः ईटावा और इटावा में परिवर्तित हो गया।