इटावा शहर का इतिहास
इटावा उत्तर प्रदेश के उन शहरों में से है जो की अपने समृद्ध इतिहास के वजह से देश भर में जाने जाते हैं। इस शहर पर मध्यकाल से लेकर आजादी के बाद तक कई ऐतिहास्तिक हस्तियों ने राज्य किया जिसमें कई बड़े मुग़ल वंश के राजा जैसे अकबर, जहांगीर, शाहजहाँ एवं औरंगज़ेब भी शामिल हैं।
मध्यकाल
दिल्ली एवं कन्नौज के पतन के तत्पश्चात 1193 ईसवी सन् में मुसलमानों ने इटावा शहर की बाग़डोर 1801 ईसवी सन् तक संभल ली। इसके उपरांत, तेरहवीं सदी में राजपूतों ने साम्राज्य का अधिग्रहण कर लिया।। इसी दौरान राजपूतों के अतिरिक्त कई और अप्रवासी जैसे की ब्रह्मण एवं कायस्थों भी जिले भर में वितरित हो गए जैसे की वर्त्तमान काल में वितरित हैं। कुछ समय के अंतराल के बाद, कर से संबंधित प्रशासनिक मुद्दों की वजह से नासिर-उद-दीन मोहम्मद शाह के राज्य में अशांति उत्पन्न हुई, परन्तु वह अशांति जल्द ही ग्वालियर के तोमर शासक द्वारा 1390 में समाप्त कर दी गईं । इसके उपरांत 1392 में राजपूतों के मुखिया नर सिंह ने बीर बहन एवं सर्वधारण के साथ संगठित होकर मुस्लिम शासन के खिलाफ आंदोलन कर दिया। 1393 में बीर बहन, अभय चाँद एवं अजित सिंह राठौर की आंदोलन के दौरान मृत्यु हो गई और केवल राय सर्वधारण जंग से सुरक्षित निकल जाने को सफल हो पाया।
इटावा में मुगल शासन
मुसलमानों के पतन के उपरांत भी इटावा कई उल्लेखनीय ऐतिहासिक गतिविधियों से जुड़ा रहा जैसे की जौनपुर अभियान इत्यादि। साथ ही साथ इटावा कई प्रसिद्द लोधी एवं मुग़ल शासकों जैसे बहलोल लोदी, इब्राहम लोदी, बाबर, हुमायूँ एवं अकबर के शासन में भी महत्वूर्ण जिला था। इसके अलावा सआदत अली खान अवध के नवाब ने इटावा को ब्रिटिश राज्य को भेंट कर दिया जिससे 1857 का विद्रोह उत्पन्न हुआ।
इटावा में 1857 के विद्रोह
1857 में ब्रिटिश राज्य के खिलाफ उत्पन्न हुए राज्य-द्रोह में इटावा समेत कई उत्तरीय जिलों में खलबली मच गई। इस दौरान कई स्वतंत्र सैनानियों ने इटावा से विरोध प्रदर्शन को संचालित किया। परन्तु जब 1857 का विरोध प्रदर्शन समाप्त हो गया तब ब्रिटिश राज्य ने दोबारा इटावा जिले में अपना शासन स्थापित कर दिया। इसके उपरांत जब भारत स्वतंत्र हो गया, इटावा में कई शहरीकरण एवं वृद्धि हुई है इसीलिए आज के समय में इटावा उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण जिलों में गिना जाता है।